रविवार, 16 जनवरी 2011

एक उन्मद -सी नदी है ,
उम्र भर बहती रहेगी,
कुछ कहूँ या ना कहूँ मैं ,
दास्ताँ कहती रहेगी,
कौन जाने जिन्दगी ये ,
एक लम्हा है मिलन का,
या विरह की इक सदी है,
जो कसक सहती रहेगी,
एक उन्मद -सी नदी है ,
उम्र भर बहती रहेगी,
कुछ कहूँ या ना कहूँ मैं ,
दास्ताँ कहती रहेगी,
कौन जाने जिन्दगी ये ,
एक लम्हा है मिलन का,
या विरह की इक सदी है,
जो कसक सहती रहेगी,एक उन्मद -सी नदी है ,
उम्र भर बहती रहेगी,
कुछ कहूँ या ना कहूँ मैं ,
दास्ताँ कहती रहेगी,
कौन जाने जिन्दगी ये ,
एक लम्हा है मिलन का,
या विरह की इक सदी है,
जो कसक सहती रहेगी,

शनिवार, 15 जनवरी 2011

उस सरित का क्या करूँ मैं,
जो द्रगों को धो रही है ,
धूप तेरे तन-बदन की,
धूप मेरी हो रही है,
सुष्मिता से भर गईं हैं ,
इस धरा की भंगिमायें,
क्या पता तुझको यहाँ पर ,
क्या नजाकत हो रही है ,
प्रज्ञा के तीन तत्त्व हैं, -विचार, भाव ,कल्पना ,इन तीनों का समायोजन
निरंतर चलता रहता है ,अगर ये ना हों या अव्यवस्थित हो जायें,जीवन
कठिन हो जाता है ,मर्मज्ञ व्यक्ति जीवन को सरल बना लेते हैं ......

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

हो सके तो आज मेरी ,
चेतना में पर लगा दो,
प्राण जो मचले हुए हैं,
इक तपन उनमें जगा दो,

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

क्यों तुम्हारे मुक्त पथ पर,
भावनायें बिछ रहीं हैं ,
क्यों तुम्हारे इंगितों में,
कल्पनायें रच रही हैं,
क्यों सुबह से शाम तक ये ,
दिन तुम्हारे साथ भटका ,
क्यों दमित -सी मृग-तृषायें ,
बस तुम्हीं से बुझ रही हैं ,