मंगलवार, 24 मई 2011

वो सुनहरे पल हमेशा साथ मेरे चल रहे हैं ,
सिर्फ तेरे ही लिए दिन -रात मेरे चल रहे हैं ,
यह नहीं मुझको पता अब ,क्या गुजरना चाहता है ,
जिन्दगी तुझमें बसी,, हालात मेरे चल रहे हैं ,

सोमवार, 23 मई 2011

जिंदगी के गूढ़ रहस्यों को समझने की कोशिस का नाम है ...'गीतों के बादल' ... . या एक ..प्रेमकाव्यग्रन्थ .. क्योंकि इस काव्यसंग्रह में जीवन भर के अनुभव और प्यार की तरुणाई... से लबरेज शब्दों की मालाएं पिरोई गई हैं .. कहने के लिए यह कविता संग्रह है जो जीवन के अनुभवों पर केंद्रित . कवि की जिंदगी में होने वाली उथल-पुथल और संघर्ष को दर्शाता है . लेकिन मेरी नज़र में यह पूरी जिंदगी की गाथा होने के साथ प्यार के प्रतीक के रूप में अपने प्राणप्रिये को समर्पित सन्देश है . जिसको पढकर लोग अपने निजी जीवन के अनुभवों को महसूस करेंगे और एक-एक लाइन में होने वाले संघर्ष को जीना चाहेंगे . गीतों की लाइने पूरी तरह झकझोर देतीं हैं ..जैसे..-----
------------............ बादलों में, सागरों में ,............. सिर्फ तेरा ही उमड़ना ,........... .. देखने की जिद हमें थी , ......... डूबकर तुझमें उतरना ,
[ श्रवण कुमार शुक्ल ]

शनिवार, 21 मई 2011

दर्द कितनी याद लेकर ,अधखिली -सी भोर लेकर,अधखिले से फूल लेकर,आँसुओं की ओस लेकर,
चहचहाता जा रहा है ,पक्षियों के साथ उड़कर,
कुछ हवा भीगी हुई है, कुछ जमीं गीली हुई है,
रेत से तपते बदन पर , प्यार की बारिश हुई है,
कर रहा शीतल जगत को ,बादलों का लेप लेकर ,
दर्द कितनी याद लेकर ,अधखिली -सी भोर लेकर,अधखिले से फूल लेकर,आँसुओं की ओस लेकर ,चहचहाता जा रहा है ,पक्षियों के साथ उड़कर.दर्द कितनी याद लेकर ,अधखिली -सी भोर लेकर,अधखिले से फूल लेकर,आँसुओं की ओस लेकर ,चहचहाता जा रहा है ,पक्षियों के साथ उड़कर.
दर्द कितनी याद लेकर .........
कुछ हवा भीगी हुई है ,कुछ जमीं गीली हुई है,
रेत से तपते बदन पर,प्यार की बारिश हुई है,

बादलों का एक कतरा ,रह गया है दूर नभ पर

बुधवार, 11 मई 2011

करवटें गुमसुम पड़ी हैं, रिक्त आलिंगन पड़े हैं,शोखियों के वो मचलते ,मुक्त कटिबंधन पड़े हैं ,क्यों फिजा में रात- रानी ,इस तरह घुलने लगी है ,आपके कितने अपरिमित, सिक्त अभिसिंचन पड़े हैं ,हो सके तो आज उनका मौन हाहाकार सुन लो /

मंगलवार, 10 मई 2011

करवटें गुमसुम पड़ी हैं, रिक्त आलिंगन पड़े हैं,
शोखियों के वो मचलते ,मुक्त कटिबंधन पड़े हैं ,
रात- रानी की फिजा में ,मौन सिहरन हो रही हैं ,
आपके कितने अपरिमित, सिक्त अभिसिंचन पड़े हैं ,
हो सके तो आज उनकी , राख़ को अभिसार दे दो ,

गुरुवार, 5 मई 2011

आपकी इतनी सजीली सुरमई यादें रखीं हैं ,
हो सके तो आज कोई ,भेंट में स्वीकार कर लो,
अश्रुपूरित से द्रगों में ,पूर्णिमायें झाँकतीं हैं ,
हो सके तो आज उन्में,कुछ नये उदगार भर दो ,
देखने वाले तुझे मैं हाल अपना क्या बताऊँ ,
उस अलौकिक ज्योत्स्ना में आज कैसे मैं नहाऊँ ,
वो कहाँ है बस जरा सी राख़ उड़ कर आ रही है,
मैं लिपटना चाहता हूँ किस तरह उसमें समाऊँ ,

रोज ही शमशान कोई ,एक मुझमें जल रहा है,
जिन्दगी का कारवां यह ,बस उसी से चल रहा है,

रविवार, 1 मई 2011

हर तरफ श्रृंगार उसका ,हर तरफ खिलवार उसका,
कुछ पलों का प्यार था वो,गोद में अंगार उसका,
ये सहमते ,थरथराते ,काँपते-से होठ लेकर,
कर रहा हूँ मैं छलकते -अश्क में दीदार उसका ,

इस जगत की कल्पना में ,जिक्र उसका चल रहा है,
जिन्दगी का कारवाँ ये ,बस उसी से चल रहा है,
साँस अबतक दूंद्तीं हैं , धड़कनों में कुछ छिपा है,
बीच में इनके गुजरकर ,कौन मुझमें चल रहा है,
जानता हूँ मैं उसे पर, रोकना मुश्किल बहुत है,
जिन्दगी का कारवां ये ,बस उसी से चल रहा है,