बुधवार, 29 दिसंबर 2010

नहीं संभला ,नहीं संभला ,
संभाले से नहीं संभला ,
तुम्हारे ख्याल में डूबा ,
हमारा दिल नहीं संभला ,
कभी ये ओस में भीगा ,
कभी ये भाप में बदला ,
धुंए के बादलों में भी ,
लिपट कर ये यहाँ निकला ,
तुम्हारी बात जब भी ये ,
यहाँ सुनता किसी से है ,
कभी ये मोम -सा पिघला ,
कभी ये बर्फ पर फिसला,
कभी तुम भी दिखाई दीं,
कभी वो चाँद भी निकला

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

जब भी कोई सुबह निकलकर
दरवाजों पर आ जाती है
तेरी-मेरी बातें सुनकर
दीवारों पर छा जाती है ,
तेरे अधर महकते से जब
मेरे अधरों को छू जाते
ये पागल,दुनिया को जाकर
मेरे गीत सुना आती है /
इसकी किरणों में घुलकर जब
तेरी किरणें मिल जातीं हैं
नन्ही-नन्ही कलियों की
पंखुडियां जैसे खिल जातीं हैं /
तेरी आँखों से होकर जब
ये राहें देखा करती है
एक दिवस के गलियारों में
तेरा जादू भर जाती है

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

कुछ धधकते प्रश्न उभरे ,कुछ धधकती साँस आई ,
क्यों वतन मेरा जलाकर ,लोग पागल हो रहे हैं ,
लूटते हैं क्यों इसे बो ,फूंकते हैं क्यों इसे वो ,
क्या उन्हें मालूम है यह ,लाल बादल हो रहे हैं ,
एक दिन उनको यहाँ पर ,धूल में मिलना पड़ेगा ,
जो घुटालों में लगे हैं ,सर पकड धुनना पड़ेगा ,
आज मेरी सर ज़मी के ,मूल्य घायल हो रहे हैं ,
क्या इसी दिन के लिए ,आजाद होने की तपिश थी ,
सरफरोशी की तमन्ना, क्या इसी दिन की कशिस थी ,
क्या इसी दिन का यहाँ पर ,एक सपना था सुनहरा ,
क्या इसी दिन की हमारे ,आंशियाँ पर यह खलिश थी ,
क्यों हमारी आशिकी के ,दिन हलाहल हो रहे हैं

सोमवार, 22 नवंबर 2010

आसमाँ को क्या खबर है जिन्दगी किसने लिखी है ,
छू लिया जिसने उसे बस, जिन्दगी उसने लिखी है ,
आदमी जो चाहता है ,वो उसे मिलता नहीं है ,
किन्तु उसने मौत पर जिन्दादिली अपनी लिखी है ,
कुछ लम्हों का खेल है यह ,दृष्टि इसकी है अपरिमित ,
कर रही है युग -युगों से इस जगत के कण विनिर्मित ,
जो यहाँ आगे बदा है ,कारवाँ उससे चला है ,
वो अगर चाहे तो करदे ,कल्पनाओं को सजीवित ,
पूछते क्यों लोग मुझसे ,जिन्दगी किसने लिखी है