शनिवार, 30 अप्रैल 2011

साँस दिन भर दूंदती है, धडकनों में कुछ छिपा है,
तुम इन्हीं में चल रही हो ,हाल बस इतना सुना है ,

गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

जिन्दगी को क्यों गवारा ,इस कदर करने लगे हैं ,
पास से निकली बहुत पर ,दरकिना करने लगे हैं ,

अब यहाँ पर क्या बचा है, सोचने से फायदा क्या ,
हम महोब्बत का ग़मों से , सामना करने लगे हैं ,

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

रात से लेकर सुबह तक,
किस तरह जीता रहा मैं,
एक सूनी जिन्दगी को ,
प्रश्नवत करता रहा मैं ?
इस सुबह की रौशनी में ,
हर किरन उम्मीद की थी ,
किस तरह खुद को संभाला ,
हौसला भरता रहा मैं,
हर कदम लड़ना पड़ेगा ,
गीत मैंने गुनगुनाया ,
यह सुबह जब मुस्कुराई,
साथ मैं भी मुस्कुराया,
इस सुबह की हलचलों में,
हर तरफ नगमे छिड़े थे,
कंगनों की खनखनाहट,
पक्षियों के स्वर भरे थे,
मंद झोंकों में पवन के,
ताजगी लहरा रही थी,
कर्म पथ पर, कर्म योगी ,
कूच करने चल पड़े थे,
मैं बिभोरित हो चुका था ,
पाँव मैंने भी बदाया ,
यह सुबह जब.......

रविवार, 24 अप्रैल 2011

इस सुबह की हलचलों में,
हर तरफ नगमे छिड़े हैं,
कंगनों की खंकनें हैं ,
पक्षियों के स्वर भरे हैं,

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

यह सुबह जब मुस्कुराई ,
साथ मैं भी मुस्कुराया,
हाल अपने आँसुओं का ,
कुछ नहीं मैंने बताया,
लोग शबनम कह रहे थे-
पत्तियों पर लद रही थी,
फूल की हर पंखुरी भी,
बस इन्हीं से खिल रही थी,
मैं पसीजा किस तरह से ,
यह नहीं मैंने जताया,
यह सुबह जब........

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

जिन्दगी को नापने का ,एक यह भी है तरीका,
यह यहाँ कितनी सफल है, और इसका क्या नतीजा,
घोलकर मैं प्यार अपना ,रोज इसमें देखता हूँ,
दीखता है बादलों में, चाँद मुझको इक अजूबा,

छा गई हो तुम कहाँ तक ,इक नया विस्तार लेकर,

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

द्रश्य कल्पित ओ अकल्पित ,एक जैसे दीखते हैं,
चेतना में बेदना के ,तन्त्र अक्सर बींधते हैं,
हैं सभी अहसास जीवित ,जो उभर कर आ रहे हैं ,
क्यों तुम्हारे साँस में ये ,साँस चलते दीखते हैं ,

शून्य को मैं भर रहा हूँ,सृष्टि का श्रृंगार लेकर,
कुछ चिता की राख़ लेकर,कुछ तुम्हारा प्यार लेकर,
होठ पर मैं रख़ रहा हूँ ,कुछ बुझे अंगार लेकर,
जिन्दगी की हर सुबह अब ,हुस्न में डूबी हुई है,
फूल शबनम से खिले हैं ,आँख क्यों भीगी हुई है,

उड़ रहा है मन -बिहग क्यों ,मौन हाहाकार लेकर,
कुछ चिता की राख़ लेकर,कुछ तुम्हारा प्यार लेकर,
होठ पर मैं रख़ रहा हूँ ,कुछ बुझे अंगार लेकर,
जिन्दगी की हर सुबह अब ,हुस्न में डूबी हुई है,
फूल शबनम से खिले हैं ,आँख क्यों भीगी हुई है,

उड़ रहा है मन -बिहग क्यों ,मौन हाहाकार लेकर,
कुछ तुम्हारी राख लेकर ,कुछ बुझे अंगार लेकर .
होठ पर मैं रख़ रहा हूँ ,देख कितना प्यार लेकर ,

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

एक दिन शायद कहीं पर,जिन्दगी से बात होगी, आदमी से बात होगी ,दिलवरों से बात होगी, कौन कितना दो रहा है, कौन कितना खो रहा है, आखिरी सीमा बचेगी, आखिरी औकात होगी,

रविवार, 17 अप्रैल 2011

हाथ छीले, पाँव छीले, स्वप्न को बेचा नहीं पर, तर पसीने में बदन था, इल्म को बेचा नहीं पर, जुल्म सहकर भी लड़े हम , जुल्म के सौदागरों से, लोग शिकवा कर रहे थे , फूल को नोचा नहीं पर,
वक्त को काता कभी था, आज वो कटता नहीं है, लोग कहते हैं यहाँ पर ,वो कभी रुकता नहीं है, लो इसे आजाद कर दो, लो हमें बरबाद कर दो, वक्त से जो पिस गया है, आदमी मरता नहीं है, हाथ छीले ,पाँव छीले, स्वप्न को बेचा नहीं पर, तर पसीने से बदन था , इल्म को बेचा नहीं पर, जुल्म सहकर भी लड़े हम, जुल्म के सौदागरों से, हार से डरना भला क्या,कस्म को तोडा नहीं पर /
मखमली एहसास उभरे,क्यों छलकते ख्वाव उभरे, झील की अंगड़ाईयों में ,वासनायें घुल रहीं हैं , दूर तक कोई नहीं है,दूंदने से क्या मिलेगा , क्यों सदाओं में अभी तक ,वो अदायें घुल रहीं हैं,

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

मखमली - अहसास उभरे, कुछ छलकते -ख्वाव उतरे, झील की अंगड़ाईयों में , वासनायें घुल रहीं हैं,

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

वक्त की शहनाइयों में वेदनायें घुल रहीं हैं, अनमनी -सी क्यों हवा में कामनायें घुल रहीं हैं,

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

बादलों को चीर कर क्यों, धूप ने जलवे बिखेरे , कोंपलों पर रश्मियों की ,कल्पनायें घुल रहीं हैं ,
वक्त की शहनाइयों में ,वेदनायें घुल रहीं हैं, क्यों हवा में काल-कवलित ,कामनायें घुल रहीं हैं ,
वक्त की शहनाइयों में, वेदनायें घुल रहीं हैं, क्यों हवा में अनमनी - सी, कामनायें घुल रहीं हैं ,
निकले जब भी यह बह-बहकर,सने हुए थे धरती -अम्बर, आँसू, शबनम, नदी , समंदर, लुप्त हो गये मेरे अन्दर,

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

शबनम की बूँदें जब बरसीं, फूलों ने ले ली अँगड़ाई, नदिया की बूँदें जब छलकीं ,कूलों पर छाई तरुणाई , सागर की बूँदें जब उफनी ,मेघों में सावन लहराया, लेकिन आँसू की बूँदों में ,कोई शोर नजर ना आया,
बूँदें तो सबमें होतीं हैं ,लेकिन आँसू किसमें होते, पूँछ रहा हूँ अपने दिल से , पिघल गया क्यों रोते-रोते ,
आँसू,शबनम,नदी,समंदर, भीग चुका हूँ अन्दर-अन्दर, उमड़ रहा है मुझमें क्या-क्या , देख रहा हूँ अन्दर-अन्दर,

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

कुछ यहाँ झीलें मिलीं फिर, कुछ यहाँ मौसम खिले फिर, थे यहाँ कुछ तो बहाने , रास्ते कुछ तो कटे फिर , थे द्रगों में स्वप्न दिन के , कर रहे थे पॉँव हलके , मंजिलों पर जिन्दगी थी, फासले कुछ तो घटे फिर,

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

तितलियाँ उड़ने लगीं फिर, कोकिलें गाने लगीं फिर , पंछियों की चिर- उड़ानें ,सामने आने लगीं फिर, डालियों ने झूमती -सी, भावनायें जब दिखाईं , धूप ने किरनें समेटीं , बदलियाँ छाने लगीं फिर ,