देखने वाले तुझे मैं हाल अपना क्या बताऊँ ,
उस अलौकिक ज्योत्स्ना में आज कैसे मैं नहाऊँ ,
वो कहाँ है बस जरा सी राख़ उड़ कर आ रही है,
मैं लिपटना चाहता हूँ किस तरह उसमें समाऊँ ,
रोज ही शमशान कोई ,एक मुझमें जल रहा है,
जिन्दगी का कारवां यह ,बस उसी से चल रहा है,
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें