शनिवार, 11 दिसंबर 2010

जब भी कोई सुबह निकलकर
दरवाजों पर आ जाती है
तेरी-मेरी बातें सुनकर
दीवारों पर छा जाती है ,
तेरे अधर महकते से जब
मेरे अधरों को छू जाते
ये पागल,दुनिया को जाकर
मेरे गीत सुना आती है /
इसकी किरणों में घुलकर जब
तेरी किरणें मिल जातीं हैं
नन्ही-नन्ही कलियों की
पंखुडियां जैसे खिल जातीं हैं /
तेरी आँखों से होकर जब
ये राहें देखा करती है
एक दिवस के गलियारों में
तेरा जादू भर जाती है

1 टिप्पणी:

  1. आदरणीय तुषार देवेन्द्र चौधरी जी
    नमस्कार !
    आप अच्छा सृजन कर रहे हैं , आभार ! बधाई ! … लेकिन आपके एक ही नाम से चार चार ब्लॉग्स पर रचनाएं देखने आना सबके लिए ही दुरूह और बोझिल होता होगा; मेरे लिए तो है ।

    निवेदन है, एक ही ब्लॉग पर सारी रचनाएं एकत्र करके पोस्ट करें , इससे आपके ब्लॉग को फॉलो करने में भी हमें सुविधा रहेगी ।

    या सब ब्लॉग्स का अलग अलग नामकरण कर दें , और जिस ब्लॉग को आप नियमित अपडेट करें उसकी सूचना मुझे मेल से करने की कृपा करें

    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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