कुछ धधकते प्रश्न उभरे ,कुछ धधकती साँस आई ,
क्यों वतन मेरा जलाकर ,लोग पागल हो रहे हैं ,
लूटते हैं क्यों इसे बो ,फूंकते हैं क्यों इसे वो ,
क्या उन्हें मालूम है यह ,लाल बादल हो रहे हैं ,
एक दिन उनको यहाँ पर ,धूल में मिलना पड़ेगा ,
जो घुटालों में लगे हैं ,सर पकड धुनना पड़ेगा ,
आज मेरी सर ज़मी के ,मूल्य घायल हो रहे हैं ,
क्या इसी दिन के लिए ,आजाद होने की तपिश थी ,
सरफरोशी की तमन्ना, क्या इसी दिन की कशिस थी ,
क्या इसी दिन का यहाँ पर ,एक सपना था सुनहरा ,
क्या इसी दिन की हमारे ,आंशियाँ पर यह खलिश थी ,
क्यों हमारी आशिकी के ,दिन हलाहल हो रहे हैं
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