शनिवार, 23 अप्रैल 2011

यह सुबह जब मुस्कुराई ,
साथ मैं भी मुस्कुराया,
हाल अपने आँसुओं का ,
कुछ नहीं मैंने बताया,
लोग शबनम कह रहे थे-
पत्तियों पर लद रही थी,
फूल की हर पंखुरी भी,
बस इन्हीं से खिल रही थी,
मैं पसीजा किस तरह से ,
यह नहीं मैंने जताया,
यह सुबह जब........

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