गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

जिन्दगी को नापने का ,एक यह भी है तरीका,
यह यहाँ कितनी सफल है, और इसका क्या नतीजा,
घोलकर मैं प्यार अपना ,रोज इसमें देखता हूँ,
दीखता है बादलों में, चाँद मुझको इक अजूबा,

छा गई हो तुम कहाँ तक ,इक नया विस्तार लेकर,

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