मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

कुछ यहाँ झीलें मिलीं फिर, कुछ यहाँ मौसम खिले फिर, थे यहाँ कुछ तो बहाने , रास्ते कुछ तो कटे फिर , थे द्रगों में स्वप्न दिन के , कर रहे थे पॉँव हलके , मंजिलों पर जिन्दगी थी, फासले कुछ तो घटे फिर,

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